Kabir ke Dohe in Hindi Pdf | कबीर के दोहे हिन्दी में अर्थ सहित

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हेलो दोस्तों स्वागत है आप सभी का हमारे एक नये ब्लॉग पोस्ट में, आज के इस पोस्ट में हम लोग देखेंगे कबीर दास जी के दोहे के बारे में जो कि आम लोगों की बोलचाल की भाषा में काफी ज्यादा प्रचलित होता है |

Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf

Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf

अगर आप कबीर दास जी के दोहे के बारे में सर्च कर रहे हैं तो आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं इस पोस्ट में हम कबीर दास जी के दोहों को अर्थ के साथ बताने जा रहे हैं |

कबीर दास जी के कुछ ऐसे भी दोहे हैं जो सामान्य बोलचाल की भाषा में बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है उन्हीं में से कुछ चुनिंदा दोहो को अर्थ के साथ आप लोगों के साथ इस पोस्ट में साझा किया जा रहा है | आज का हमारा विषय है Best 100+ Kabir ke Dohe in Hindi Pdf | कबीर के दोहे अर्थ सहित पीडीएफ के बारे में चर्चा |

Kabir Ke Dohe In Hindi Pdf | कबीरदास के दोहे हिन्दी में अर्थ ब्याख्या सहित

दोस्तों इस पोस्ट को शुरू करने से पहले कुछ कबीर दास जी के बारे में जानकारी कर लिया जाए जैसे कि दोस्तों आप सभी को पता है कबीर दास जी का जन्म हुआ था

वह 15 वीं शताब्दी में हुआ था हालांकि स्पष्ट नहीं माना जाता है यह ठीक-ठाक जानकारी नहीं है फिर भी एक मान्यता के अनुसार कबीर दास जी का जन्म 1398 संवत 1455 में उत्तर प्रदेश की काशी ( वाराणसी) लहरतारा नामक स्थान पर 1 जुलाहे परिवार में हुआ था |

कबीर दास जी को उनके दोनों के कारण पूरे विश्व में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है क्योंकि कबीर दास जी की दोहों में बहुत ही गहराई और सच्ची बातें होती थी जो बिल्कुल आम जन जीवन से जुड़ी हुई थी |

कबीर दास जी 15वीं शताब्दी के सबसे महान क्रांतिकारी व्यक्तियों में से एक थे और उन्होंने अपनी कविताओं और दोहों के माध्यम से भारतीय समाज में बदलाव लाने की काफी कोशिश की |

उनके दोहों का काफी असर पड़ा था भारतीय समाज में जिसका प्रभाव देखने को मिलता है आज भी Kabir ke dohe ine Hindi PDF आज भी सम्पूर्ण विश्व में मशहूर है |

कबीर दास जी हिंदू और मुसलमान दोनों धर्म को मानते हुए वह सर्वोच्च ईश्वर में विश्वास रखते थे, उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांडों,अंधविश्वासों, की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना भी किया अपने इन दोहों के माध्यम से |

कबीर दास जी की प्रमुख रचना जो है वह बीजक थी और बीजक में तीन रचनाएं साखी,सबद, रमैंणी | साखी का अर्थ होता है साक्षी, सबद का अर्थ होता है शब्द, और रमैनी का अर्थ होता है रामायण |

इस लेख में कबीर के दोहों के हिंदी अनुवादो को शामिल किया गया है Kabir ke dohe in hindi pdf

Kabir Ke Dohe in Hindi PDF with meaning

:> ( कबीर के दोहे ):-

  1. Kabir ke Dohe in Hindi Pdf

पोथी पढ़ि पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोय |

ढाई आखर प्रेम का, पढ़ें सो पंडित होय ||

अर्थ भावार्थ सहित :- कबीर दास जी के इस दोहे के अनुसार, बहुत ज्यादा पुस्तकों को पढ़ते पढ़ते कोई व्यक्ति विद्वान नहीं बनता है की बहुत सारे लोग बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ने मृत्यु को प्राप्त कर प्राप्त कर लेते हैं अच्छे विद्वान नहीं बन पाते हैं जो लोग प्रेम के ढाई अक्षर का मतलब समझ गए उन लोगों से बड़ा कोई विद्वान नही इसका मतलब यह है कि लोगों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ प्रेम शब्द के वास्तविक अर्थ को समझना चाहिए !

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय |

जो दिल खोजा आपने, मुझसे बुरा न कोय ||

अर्थ भावार्थ सहित :- कबीर दास जी इस दोहे के अंतर्गत कहते हैं कि जब वह बुराई को खोजने के लिए संसार में निकले तब उनको कोई भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला | और जब वह खुद अपने अंदर झांक कर देखे तो उनको पता चला कि उनसे बुरा कोई भी व्यक्ति नहीं है इस संसार में,

मतलब यह है कि किसी भी व्यक्ति को एक दूसरे के अंदर बुराई निकालने से पहले अपने अंदर छिपी हुई बुराई को देखना और समझना चाहिए आकलन करना चाहिए उसके बाद किसी दूसरे को बुरा कहना चाहिए |

काल करै सो आज कर, आज करे सो अब|

पल में प्रलय होयगी, बहुरि करेगा कब ||

अर्थ भावार्थ सहित :- इस दोहे के भाव से कबीर जी कहते हैं कल जो काम करना है उसको आज किया जाए और आज जो काम करना है उसको अभी किया जाए | क्योंकि पल भर में प्रलय हो जाएगा आप अपना काम कब करेंगे |

अर्थात किसी भी काम को करने के लिए एक समय निर्धारित ना करें जो भी आपको काम करना है वह समय से कर लिया जाए क्योंकि कुछ भी हो सकता है किसी भी समय कोई नहीं जानता है |

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दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय |

जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय |

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अर्थ भावार्थ सहित :- इस दोहे के माध्यम से कबीर जी यह बताना चाहते हैं संसार को की दुख में हर इंसान भगवान को ईश्वर को अल्लाह को याद करता है लेकिन सुख के समय में कोई भी अपने ईश्वर को अपने भगवान को अपने अल्लाह को नहीं पूछता है

अगर इंसान सुख में भी ईश्वर को याद करें तो उसको दुख कभी आएगा ही नहीं | अर्थात कबीर जी यह बताना चाहते हैं कि दुख के समय में सभी व्यक्ति ईश्वर को पूजते हैं, और सुख का समय आते ही भूल जाते हैं अगर सुख के समय भी भगवान को याद किया जाए उनकी पूजा अर्चना किया जाए तो उसको दुख होना ही नहीं है ||

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जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान|

मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान ||

अर्थ भावार्थ सहित :- इस दोहे के अंतर्गत कबीर दास जी यह बताते हैं कि किसी भी व्यक्ति से उसकी जाति धर्म नहीं पूछनी चाहिए, बल्कि उससे ज्ञान की बात करनी चाहिए | क्योंकि वास्तव में मोल या महत्ता तो तलवार का ही होता है उसके म्यान का नहीं | म्यान में तलवार केवल रखा जाता है |

मतलब यह है कि किसी भी व्यक्ति का जाति धर्म बड़ा नहीं होता है अगर वह व्यक्ति ज्ञानवान है तो उसके जाति धर्म से ऊपर उसके ज्ञान को महत्ता देनी चाहिए ना कि उस व्यक्ति के धर्म जाति या मजहब को |

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अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप |

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ||

अर्थ भावार्थ सहित :- इस दोहे के माध्यम से कबीर दास जी यह संदेश देना चाहते हैं कि कभी भी जरूरत से ज्यादा बोलना अच्छा नहीं होता है और ना ही जरूरत से ज्यादा शांत रहना ही अच्छा होता है |

जिस प्रकार बहुत ही ज्यादा बारिश या वर्षा का होना अच्छा नहीं होता है और ना ही बहुत ज्यादा झूठ अच्छा होता है |

अर्थात किसी भी इंसान को बहुत ज्यादा बोलना भी नहीं चाहिए और बहुत ज्यादा शांति भी नहीं रहना चाहिए, जरूरत के हिसाब से ही सारी चीजें अच्छी होती है किसी भी चीज का बहुत ज्यादा होना ठीक नहीं होता है |

Kabir ke Dohe in Hindi Pdf

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आप खोये |

औरन को शीतल करें, आपहुँ शीतल होए ||

अर्थ भावार्थ सहित :- इस दोहे के माध्यम से कबीर दास जी यह कहना चाहते हैं कि मनुष्य को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छा लगे | इस तरह की भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुंचाती ही है इसके साथ-साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव महसूस होता है |

अर्थात किसी भी व्यक्ति से इस तरीके से बोला जाए कि वह भाषा उस व्यक्ति को भी अच्छा लगे और अपने आप को भी अच्छा लगे |

किसी भी व्यक्ति के दिल को ठेस पहुंचाने वाली भाषा का प्रयोग ना करें जो अपने आप के लिए भी कष्टदायी है और दूसरों के लिए तो होगा ही इसलिए हमेशा अच्छी भाषा का प्रयोग करना चाहिए |

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पत्थर पुजें हरि मिले, तो मैं पूजू पहार |

तातें तो चक्की भली, पीस खाए संसार ||

अर्थ भावार्थ सहित :- कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से मनुष्य को यह समझाते हुए कहते हैं कि किसी भी धर्म के देवी देवता का अगर आप पत्थर की मूर्ति बना करके उसकी पूजा अर्चना करते हैं तो यह तार्किक रूप से सही नहीं है |

जो कि हमें कुछ दे नहीं सकता किसी भी देवी देवता के मूर्ति पूजा करने से बेहतर यह होगा कि उस आटा की चक्की की पूजा की जाए जिससे सभी लोगों को खाना खाने के लिए भोजन करने के लिए आटा मिलता है |

कबीर दास जी का यह तर्क है कि किसी भी धर्म के देवता की मूर्ति पत्थर की हो या किसी की भी हो वह महत्वपूर्ण नहीं है | उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आपके लिए जो वास्तविक रूप से आपके साथ काम करें वह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होगा इस सांसारिक जीवन में वास्तविकता को समझाना चाहते हैं |

Kabir ke Dohe In Hindi Pdf Download

Book Name Kabir ke Dohe In Hindi
Author Kabir Das
Pdf Size0.31 MB
File TypesPdf
Pdf Page 36
Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf

मानुष जन्म दुर्लभ है, मिले न बारम्बार |

तरवर से पत्ता टूट गिरे, बहुरि न लागे डारि ||

अर्थ भावार्थ सहित :- इस दोहे के माध्यम से कबीर दास जी यह बताना चाहते हैं संसार को, कि यह शरीर बार-बार मनुष्य को नहीं मिलता है जो फल वृक्ष से नीचे टूट कर गिर पड़ता है वह पुनः दोबारा उसकी डाल पर नहीं लगता या नहीं उगता है |

ठीक इसी तरह से मनुष्य के शरीर को छूट जाने पर दोबारा मनुष्य का जन्म मिलना आसानी से संभव नहीं होता है और सीवाय पछताने के कोई और दूसरा चारा नहीं रह जाता है |

अर्थात मनुष्य को यह बात समझना चाहिए कि यह मनुष्य का जो तन है शरीर है वह बार-बार नहीं मिलता है एक बार जो शरीर मिला है वह दोबारा मिलेगा या नहीं यह कोई नहीं जानता, जो मिला है उसका इस्तेमाल आप सही तरीके से करें |

इस दोहे में उन्होंने उदाहरण दिया है जिस प्रकार से डाली से उसका पत्ता टूट कर गिर जाता है तो फिर दोबारा वह पत्ता उस डाली पर नहीं जा कर लग पाएगा ,

ठीक उसी प्रकार मनुष्य का यह जो शरीर है वह एक बार अगर नष्ट हो गया तो दोबारा उसका मिलना लगभग असंभव हो जाता है | इसलिए यह जो मनुष्य का जीवन मिला है इसका सदुपयोग करें, इस जीवन को व्यर्थ न जाने दें |

Kabir ke Dohe in Hindi Pdf

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ |

मैं बपूरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ||

अर्थ भावार्थ सहित :- इस दोहे के माध्यम से कबीर दास जी यह बताना चाहते हैं कि जो लोग कुछ खोजने का प्रयास करते हैं उन्हें कुछ न कुछ हांसिल हो जाता है वहीं अगर कुछ लोग केवल यह सोचकर पानी में नहीं उतरते हैं कि पानी की गहराई समुद्र की गहराई बहुत ज्यादा है

वह बस किनारे बैठ करके और उसका इंतजार करते रहते हैं कि पानी ज़ब कम होगा तब वह पानी में उतरेंगे और कुछ करने का प्रयास नहीं करते हैं उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता |

अर्थात इस दोहे के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि अगर कुछ करने का प्रयास किया जाए तो कुछ न कुछ प्राप्त किया जा सकता है लेकिन अगर यह सोचकर बैठ जाया जाए कि जब मौका मिलेगा तब हम प्रयास करेंगे तो ऐसे व्यक्ति सफल नहीं होते हैं

एक कहावत कही जाती है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार किसी भी कार्य को करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए तब जाकर आपको सफलता हासिल होती है केवल सोच कर बैठने से कुछ हासिल नहीं होता है सोच करके उसको करना पड़ता है मैदान में उतरना पड़ता है युद्ध जीतने के लिए मैदान में उतरना पड़ता है |

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय |

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय ||

Kabir ke Dohe in Hindi Pdf


अर्थ भावार्थ सहित
:- इस दोहे के अंतर्गत कबीर दास जी यह बताना चाहते हैं, संसार को, कि कभी भी किसी भी मनुष्य को किसी तिनके का भी अपमान या बेइज्जत नहीं करना चाहिए जो आपके पैर के नीचे आ जाता है क्योंकि वही तिनका उड़कर के जब मनुष्य के आंख में पड़ जाता है तो बहुत ज्यादा हानि या नुकसान पहुंचाता है |

अर्थात संसार में कितना भी छोटा कोई व्यक्ति हो किसी का भी अपमान यह बेइज्जत नहीं करना चाहिए निंदा नहीं करनी चाहिए क्योंकि कितना भी छोटा कोई व्यक्ति हो कितना भी छोटा कोई समान हो उसकी भी जरूर इंसान को पड़ ही जाती है इसलिए किसी की भी निंदा या बुराई नहीं करनी चाहिए |

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर |
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर
||

अर्थ भावार्थ सहित :- कबीर दास जी इस दोहे के माध्यम से संसार के सभी लोगों को यह सन्देश देना चाहते है कि जो लोग यह सोचते है कि हाथ में मोतियों कि माला लेकर उसे एक लंम्बे समय तक घुमाने से उनके मन के भाव बदल जायेंगे तो ये संभव नहीं है

क्योंकि अगर मोतियों कि माला लेकर मन के भाव को बदला जा सकता है

तो इसके जरिए हर कोई अपने मन के भाव को बदल ले। 

अर्थात इसका मतलब यह है कि लोगो को मोतियों की माला कि जगह उन्हें अपने मन कि मोतियों को घुमाना चाहिए जिससे कि उनका मन शांत और स्थिर होगा।

Kabir ke Dohe in Hindi Pdf

Kabir ke Dohe in Hindi Pdf ( कबीर के दोहे से संबंधित पूछे जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर दिए गए हैं जो कि कबीर दास के दोहे को समझने के लिए काफी हद तक मदद करेंगे ||

प्रश्न: कबीर के दोहे क्या होते हैं?

उत्तर: कबीर के दोहे संत कबीर द्वारा लिखे गए छोटे-छोटे भक्तिसार होते हैं, जिनमें वे आध्यात्मिक और दार्शनिक विचार व्यक्त करते हैं। ये दोहे संसार के जीवन की मूल सिद्धियों को समझाने में मदद करते हैं और उनकी अद्वितीय शैली से प्रेरित होकर लोगों को सही मार्ग पर चलने की सलाह देते हैं।

प्रश्न: कबीर के दोहों का महत्व क्या है?

उत्तर: कबीर के दोहों का महत्व उनके व्यक्तिगत, सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण से होता है। ये दोहे संसार में अच्छाई, न्याय, त्याग, ध्यान, और सहयोग के महत्वपूर्ण मूल्यों की महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं। वे व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करने, आत्म-विकास करने, और उच्च आदर्शों की प्राप्ति के प्रति प्रेरित करते हैं।

प्रश्न: कबीर के दोहों का भाषा में क्या महत्व है?

उत्तर: कबीर के दोहे उनकी अनूठी भाषा में होते हैं, जिसमें साधारण लोगों की समस्याओं और जीवन की अद्भुतता को सुंदरता के साथ व्यक्त किया गया है। उनकी भाषा में आसानी से समझने और याद करने में मदद होती है, जिससे वे अपने संदेश को जनसामान्य लोगों तक पहुँचा सकते हैं।

प्रश्न: कबीर के दोहों से क्या सिखा जा सकता है?

उत्तर: कबीर के दोहे से हम यह सीख सकते हैं कि जीवन को सरलता और समझदारी से कैसे जीना चाहिए। वे हमें सच्चे प्रेम, समर्पण, आत्म-नियंत्रण, और ध्यान की महत्वपूर्णता के बारे में सिखाते हैं। कबीर के दोहों से हम यह भी सीख सकते हैं कि सच्चे आनंद और शांति केवल आंतरिक स्थिति से ही प्राप्त हो सकते हैं, और न कि बाहरी सामग्रियों से।

निष्कर्ष: कबीर के दोहे एक महान भक्त, विचारक और संत के जीवन के मूल्यवान सिद्धांतों को सुंदरता के साथ व्यक्त करते हैं। इन दोहों के माध्यम से हम सच्चे आत्म-समर्पण, प्रेम, सहयोग, और आत्म-विकास की महत्वपूर्णता को समझते हैं, जो हमारे जीवन को उद्धारणीय और उत्कृष्ट बनाते हैं।

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